गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

पंडित महेन्द्रपाल आर्य के प्रश्नों के उत्तर



بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील और अत्यन्त दयावान हैं
प्रिय मित्रो, कुछ समय से इन्टरनेट पर पंडित महेंद्रपाल आर्य के 15 प्रश्नों की अधिक चर्चा थी। आर्य समाज की विचारधारा के लोग इस प्रश्नपत्र को प्रचारित कर रहे हैं, और इस प्रश्नपत्र के उत्तर की मांग कर रहे हैं। जब हमने इन प्रश्नों का अध्यन किया तो पता चला कि अधिकतर प्रश्न स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 14 और बाबू धर्मपाल आर्य की पुस्तक 'तरके इस्लाम' की ही नक़ल हैं। बाबु धर्मपाल ने भी पंडित जी की तरह इस्लाम को छोड़ कर आर्य समाज को अपनाया था। लेकिन बाद में मुस्लिम विद्वानों के उत्तर से संतुष्ट हो कर उन्हों ने फिर से इस्लाम स्वीकार कर लिया और अपना नाम गाजी महमूद रखा। प्रश्नपत्र के आरम्भ में पंडित महेंद्रपाल ने लिखा है-
इस्लाम जगत के विद्वानों से कतिपय प्रश्न
सही जवाब मिलने पर इस्लाम स्वीकार
हालांकि, सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 14 का इस्लाम के विद्वानों ने पहले ही विस्तृत उत्तर दे दिया है, और हम भी अपनी वेबसाइट पर नए तथ्यों के साथ उसका उत्तर दे रहे हैं [क्लिक करें]। इस के बावजूद हम पंडित जी के प्रश्नों के उत्तर देने जा रहे हैं ताकि वह यह न कहें कि मुसलमान इनके उत्तर नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त पंडित जी की घोषणा में हमें विरोध दिख रहा है। प्रश्नपत्र के आरम्भ में वह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि यदि उनके प्रश्नों के सही उत्तर मिलें गे तो वह इस्लाम स्वीकार करें गे। लेकिन प्रश्नपत्र के अंत में वह कहते हैं, "सभी प्रश्नों का सही जवाब मिलने पर इस्लाम को स्वीकार करने को विचार किया जा सकता है."
यदि सही उत्तर मिल जाएँ तो फिर विचार क्या करना है? सीधे स्वीकार ही करलें। मैं आशा करता हूँ कि महेन्द्रपाल जी इस उत्तर से संतुष्ट हो कर इस्लाम स्वीकार करें गे.

प्रश्न 1
उत्तर
जिस आयत पर आपने आक्षेप किया है उसका सही अनुवाद यह है।
"ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों के विरुद्ध काफिरों को अपना संरक्षक मित्र न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं..." [सूरह आले इमरान, आयत 28]
इस आयत में जो अरबी शब्द "अवलिया" आया है। उसका मूल "वली" है, जिसका अर्थ संरक्षक है, ना कि साधारण मित्र। अंग्रेजी में इसको "ally" कहा जाता है। जिन काफिरों के बारे में यह कहा जा रहा है उनका हाल तो इसी सूरह में अल्लाह ने स्वयं बताया है। सुनिए।
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ ۖ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ
"ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं।" [सूरह आले इमरान, आयत 118]
पंडित जी, आप ही कहिए, ऐसे काफिरों से किस प्रकार मित्रता हो सकती है? यह तो एक स्वाभाविक बात है कि जो लोग हमसे हमारे धर्म के कारण द्वेष करें और हमें हर प्रकार से नुकसान पहुंचाना चाहें उन से कोई भी मित्रता नहीं हो सकती | कुरआन में गैर धर्म के भले लोगों से दोस्ती हरगिज़ मना नहीं है। सुनिए, कुरआन तो खुले शब्दों में कहता है।
لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ ﴿٨﴾ إِنَّمَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ قَاتَلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَأَخْرَجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ وَظَاهَرُوا عَلَىٰ إِخْرَاجِكُمْ أَنْ تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ﴿٩
"अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है।" [सूरह मुम्ताहना; 60, आयत 8-9]
और सुनिए
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
"ऐ ईमानवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं।" [सूरह माइदह 5, आयत 8]
अल्लाह कभी लोगों को नहीं बाँटते। सब अल्लाह के बन्दे हैं। लोग अपनी मूर्खता और हठ से बट जाते हैं। जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते वह स्वयं अलग हो जाते हैं। इसमें अल्लाह का क्या दोष?
इन आयात से स्पष्ट होता है कि कुरआन सभी गैर मुस्लिमों से मित्रता करने से नहीं रोकता। तो यह है इस्लाम की शिक्षा जो सुलह, अमन और इन्साफ की शिक्षा है।

वेदों की शिक्षा


ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
और सुनिए
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।" [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।
पंडित जी, मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या है? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे?
पंडित जी ने लिखा है कि गैर मुस्लिमों को हैवान कहना चाहिए| हम भला उनको हैवान क्यों कहें? यह तो आपके धर्म और गुरु की शिक्षा है कि आर्यावर्त की सीमाओं के बाहर रहने वाले सारे मनुष्य म्लेच्छ, असुर और राक्षस हैं| सुनिए ज़रा, दयानन्द जी मनुस्मृति के आधार पर क्या कह रहे हैं,
आर्य्यवाचो मलेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः| [मनुस्मृति 10/45]
मलेच्छ देशस्त्वतः परः| [मनुस्मृति 2/23]
“जो अर्य्यावर्त्त देश से भिन्न देश हैं, वे दस्यु और म्लेच्छ देश कहाते हैं| इस से भी यह सिद्ध होता है कि अर्य्यावार्त्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव और पश्चिम देशों में रहने वालों का नाम दस्यु और म्लेच्छ तथा असुर है| और नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय दिशाओं में आर्य्यावर्त्त से भिन्न रहने वाले मनुष्यों का नाम राक्षस है| अब भी देख लो हब्शी लोगों का स्वरुप भयंकर जैसे राक्षसों का वर्णन किया है, वैसा ही दिख पड़ता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 8, पृष्ट 225-226 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।
प्रश्न 2
उत्तर
पंडित जी के दुसरे प्रश्न में भी काफी गलतियाँ हैं|
गलती 1। फरिश्तों ने मिटटी लाने से मना किया। इस का कोई प्रमाण कुरआन से दीजिए।  यदि पंडित के पास इसका प्रमाण नहीं दिखाएँ गे तो पंडित जी झूटे साबित हो जाएँ गे।
गलती 2। यह 'अजाजील' नाम आप कहाँ से ले आए? कुरआन में इब्लीस का वर्णन है। और यह भी आपने गलत कहा है कि वह फ़रिश्ता था। कुरआन तो स्पष्ट कहता हे कि इब्लीस जिन था [देखो सूरह 18: आयत 50]
गलती 3। 'अजाजील ने कहा की अल्लाह आपने तो आपको छोड़ दुसरे को सिजदा करने को मना किया था' यह भी गलत है'। इब्लीस ने ऐसा कभी नहीं कहा। पंडित जी कृपया कुरआन से अपने दावों का प्रमाण भी दिया करें। सजदा यहाँ सम्मान का प्रतीक है न कि इबादत का सजदा। वेदों में भी शब्द नमन (झुकना/सजदा) को ईश्वर के अलावा अन्य के लिए प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए देखियह ऋग्वेद 10/30/6
एवेद यूने युवतयो नमन्त
"जिस प्रकार युवतियें युवा पुरुष के प्रति नमती हैं.."
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यजुर्वेद में चोरों, तस्करों और डाकुओं को भी नमन किया गया है । उदाहरण के लिए देखिए यजुर्वेद अध्याय 16, मंत्र 21
नमो॒ वञ्च॑ते परि॒वञ्च॑ते अर्थात, छल से दूसरों के पदार्थों का हरण करने वाले और सब प्रकार से कपट के साथ व्यवहार करने वाले को प्रणाम
स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ चोरों के अधिपति को प्रणाम
तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ तस्करी/डकैती करने वाले के अधिपति को प्रणाम
आशा है कि पंडित जी वेद की इन शिक्षाओं पर भी टिपण्णी करेंगे ।
गलती 4। यह आप ने ठीक कहा कि अल्लाह ने आदम को सारी वस्तुओं के नाम बताए। लेकिन आपत्ति करने से पहले इसका अर्थ तो समझ लेते। 'वस्तुओं के नाम सिखाना' प्रतीक है ज्ञान का। अर्थात आदम (मानवता) की विशेषता ज्ञान होगा। फरिश्तों ने एक शंका व्यक्त की थी कि क्या मनुष्य पृथ्वी पर बिगाड़ पैदा करे गा? उस शंका को दूर करने के लिए अल्लाह ने आदम को ज्ञान प्रदान किया। यही ज्ञान है जिसके कारण मनुष्य ने क्या क्या कारनामे नहीं किए हैं यहाँ तक कि इंसान चाँद पर भी पहुँच गया है। इस ज्ञान से इंसान ने हर वस्तु को अपने काबू में कर लिया।
हर वस्तु की अपनी विशेषता होती है और अल्लाह ने इंसान को ज्ञान प्राप्त कर तरक्की करने की विशेषता दी है। इसी ज्ञान से वह अल्लाह को भी पहचानता है। इस घटना से अल्लाह ने हमें यह समझाया है कि फ़रिश्ते, जिन और इंसान उतना ही जान सकते हैं जितना अल्लाह ने उन्हें ज्ञान दिया है।
गलती 5। आप कहते हैं कि 'अज़ाजील (इब्लीस) को गुस्सा आना स्वाभाविक था'। यह तो सरासर गलत है। इब्लीस ने आदम के सामने केवल घमंड के कारण सजदा (सम्मान) नहीं किया। कृपया कुरआन को ध्यान से पढ़िए । कुरआन कहता हे
قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا مَنَعَكَ أَنْ تَسْجُدَ لِمَا خَلَقْتُ بِيَدَيَّ ۖ أَسْتَكْبَرْتَ أَمْ كُنْتَ مِنَ الْعَالِينَ
(अल्लाह ने) कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उसको सजदा करने से रोका जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया? क्या तूने घमंड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है?"
قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِنْهُ ۖ خَلَقْتَنِي مِنْ نَارٍ وَخَلَقْتَهُ مِنْ طِينٍ
उसने कहा, "मैं उससे उत्तम हूँ। तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया।"[सुरह साद 38: आयत 75-76]
तो इससे सिद्ध होता है कि इब्लीस ने केवल घमंड के कारण अल्लाह की आज्ञा को नहीं माना। उसने अपने आप को दुसरे (आदम) से उच्च समझ लिया। इस लिए अल्लाह ने कोई पक्षपात नहीं किया| आपकी समझ का फेर है।
गलती 6। आप कहते हैं कि "अज़ाजील को नाम बताए बिना पुछा जाना कि अगर तुम सत्यवादी हो तो सभी चीज़ों के नाम बताओ"
आपक कृपया यह कुरआन से प्रमाण दीजिए कि इब्लीस (आपका अज़ाजील) को कहाँ पुछा नाम बताओ? नाम तो फरिश्तों से पूछे गए इब्लीस से नहीं। लगता हे आपने कुरआन ठीक से पढ़ा ही नहीं। आपने तो सारी घटना ही उलट पुलट बयान की है।
अब में आपकी कोन कोन सी गलती निकालूँ? इस प्रश्न से यह सारी गलतियाँ निकलने पर तो आपके प्रश्न में कुछ नहीं बचता।
प्रश्न 3
उत्तर
अल्लाह के मार्ग पर रहने का अर्थ समझ लीजियह। जब इंसान अल्लाह के उपदेश का पालन करे गा वह गुमराह नहीं होगा। और जब अल्लाह के उपदेशों से मुंह मोड़ लेगा तो गुमराह होगा। यदि वह पश्चाताप करके अपनी भूल को सुधारना चाहे तो वह फिर से सीधे मार्ग पर लोट आएगा। यदि सीधे मार्ग पर जल्दी से न लोटे तो गुमराही बढ जायह गी।
आदम अल्लाह के रास्ते पर थे लेकिन क्षण भर के लिए इब्लीस के बहकावे में आगए। उन्हों ने उस क्षण में अल्लाह की चेतावनी को भुला दिया। लेकिन फिर अपनी गलती का एहसास हुआ और अल्लाह से क्षमा चाही।
قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
अर्थात दोनों (आदम और उनकी पत्नी) बोले, "हमारे रब! हमने अपने आप पर अत्याचार किया। अब यदि तूने हमें क्षमा न किया और हम पर दया न दर्शाई, फिर तो हम घाटा उठानेवालों में से होंगे।" [सूरह आराफ 7:आयत 23]
आप पूछते हैं कि "अल्लाह ने चोर को चोरी करने व गृहस्ती को सतर्क रहने को कहा, क्या यह काम अल्लाह की धोकेबाज़ी का नहीं रहा?"
पंडित जी आप अल्लाह की सृष्टि निर्माण योजना को समझे ही नहीं हैं। इबलीस की चोर से तुलना करना मूर्खता है। चोर तो आज कल भी दुनिया में मिलते हैं, तो आप का ईश्वर उनका कुछ क्यों नहीं बिगाड़ लेता? क्या वह इस पाप को मिटाना नहीं चाहता? या मिटाने की क्षमता नहीं रखता? या पाप को फिलहाल न मिटाने में कोई विशेष नीति है? जो आप इस प्रश्न का उत्तर देंगे वही हमारी तरफ से उत्तर समझ लीजिए गा। फिलहाल संक्षेप में बता दूँ कि शैतान को मोहलत, नेकी और पुण्य की कीमत बढ़ाने के लिए दी गई।
कुरआन हमें यह बताता हे की हम इस दुनिया में परीक्षा से गुज़र रहे हैं।
الَّذِي خَلَقَ الْمَوْتَ وَالْحَيَاةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا
"जिसने पैदा किया मृत्यु और जीवन को, ताकि तुम्हारी परीक्षा करे कि तुममें कर्म की दृष्टि से कौन सबसे अच्छा है।" [सूरह मुल्क 67; आयत 2]
इस प्रसंग में इब्लीस के प्रभाव का क्षेत्र केवल इतना है कि वह मनुष्य को पाप की और निमंत्रण देता है। उस निमंत्रण को स्वीकार या अस्वीकार करना हम पर निर्भर है। कुरआन हमें क़यामत के दिन इब्लीस के शब्दों की सुचना देता है।  सुनिए
وَقَالَ الشَّيْطَانُ لَمَّا قُضِيَ الْأَمْرُ إِنَّ اللَّهَ وَعَدَكُمْ وَعْدَ الْحَقِّ وَوَعَدْتُكُمْ فَأَخْلَفْتُكُمْ ۖ وَمَا كَانَ لِيَ عَلَيْكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ إِلَّا أَنْ دَعَوْتُكُمْ فَاسْتَجَبْتُمْ لِي ۖ فَلَا تَلُومُونِي وَلُومُوا أَنْفُسَكُمْ ۖ مَا أَنَا بِمُصْرِخِكُمْ وَمَا أَنْتُمْ بِمُصْرِخِيَّ ۖ إِنِّي كَفَرْتُ بِمَا أَشْرَكْتُمُونِ مِنْ قَبْلُ ۗ إِنَّ الظَّالِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
"जब मामले का फ़ैसला हो चुकेगा तब शैतान कहेगा, "अल्लाह ने तो तुमसे सच्चा वादा किया था और मैंने भी तुमसे वादा किया था, फिर मैंने तो तुमसे सत्य के प्रतिकूल कहा था। और मेरा तो तुमपर कोई अधिकार नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने तुम को (बुरे कामों की तरफ) बुलाया और तुमने मेरा कहा मान लिया; बल्कि अपने आप ही को मलामत करो, न मैं तुम्हारी फ़रियाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रियाद सुन सकते हो। पहले जो तुमने सहभागी ठहराया था, मैं उससे विरक्त हूँ। निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखदायिनी यातना है" [सुरह इब्राहीम 14; आयत 22]
कैसा होगा वह समय जब कयामत के दिन शैतान आपसे भी यही कहेगा कि पंडित जी मैं ने आपकी कुछ झूठी बातों को सुनकर सोचा कि आपको पक्का झूटा बन जाने का निमंत्रण ही दे दूँ और आपने मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लिया। तभी तो प्रश्न 2 में आपने दुनिया वालों को अपने पक्के झूटे होने का सबूत दे दिया।
यदि आपको यह समझ में नहीं आए तो आपको इसी दुनिया से कुछ उदाहरण आपके सामने रखता हूँ। multiple choice question paper के बारे में शायद आपने सुना हो। यह अधिकतर परीक्षाओं में अपनाया जाता है, जिन से एक विद्यार्थी की वास्तविक योग्यता की जांच की जाती है। इस तरह की परीक्षा की विशेषता यह होती है कि विद्यार्थी को 4 विकाल्प दिए जाते हैं, जिन में से तीन गलत और एक सही होता है। जो विद्यार्थी इन में से अपने अध्ययन के आधार पर गलत जवाब से बच कर सही उत्तर दे, वह ही चयन के योग्य है। प्रश्न पत्र में नकारात्मक अंक (negative marking) भी होता है। हर गलत उत्तर के लिए 0.25 अंक काटे जाते हैं। यदि आपने multiple choice questions नहीं देखे हैं, तो में एक उदाहरण आपके समक्ष रखता हूँ।
प्रश्न: किसने यह आह्वान किया की “पुनः वेदों को अपनाएं”?
(A)    रामकृष्ण परमहंस
(B)    विवेकानंद
(C)    ज्योतिबा फूले
(D)    दयानन्द सरस्वती
अब इसका उत्तर तो आपको मालूम ही होगा। लेकिन सही उत्तर के साथ इसमें 3 गलत उत्तर भी रख दिए गए हैं। अब इस में सोचने की बात यह है की चयन करता ने जानते बूझते 3 गलत विकल्प उत्तर में क्यों डाले? और गलत विकल्प चुनने पर 0.25 अंक क्यों काटे? आप भी थोड़ा सा सोचिए। आपको स्वयं उत्तर मिल जाए गा।
अच्छा यह भी बताइए कि आप के ईश्वर ने ज़हर को क्यों पैदा किया? आपका उत्तर क्या होगा? क्या आपका ईश्वर धोकेबाज़ है?

वैदिक ईश्वर के कारनामे



यजुर्वेद अध्याय 30, मंत्र 5 में लिखा है कि लोगों को विभिन्न धर्मों और व्यवसायों में ईश्वर ने पैदा किया। जहां ईश्वर ने अच्छे व्यवसाय पैदा किए वहीं बुरे व्यवसाय भी पैदा किए। उसने जहां ब्रह्म॑णे ब्राह्म॒णं (वेद के लिए ब्रह्मण को पैदा किया), वहीं कामा॑य पुँश्च॒लूम(समागम के लिए वेश्या को पैदा किया)। जिस प्रकार ब्रह्मण का धर्म वेद है, क्षत्र्य का धर्म नीति की रक्षा, वैश्य का धर्म व्यापार, शूद्र का धर्म सेवा है, उसी प्रकार एक वेश्या का धर्म व्यभिचार है। दुनिया में जिस प्रकार हर कोई व्यक्ति अपना अपना धर्म फेला रहा है, इसी प्रकार, वह भी अपना धर्म फेला रही है, और अन्य लोगों के गुमराह होने का कारण बन रही है।
पंडित जी अब आप वैदिक ईश्वर को धोकेबाज़ कहें गे?
आप कहते हैं

"अवश्य कुरआन का तथा मुसलमानों का अल्लाह तो धोकेबाज़ हे ही। इसका प्रमाण कुरआन  में ही मोजूद हे, देखें -
وَمَكَرُوا وَمَكَرَ اللَّهُ ۖ وَاللَّهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ
अर्थ- मकर करते हैं वह, मकर करता हूँ में और में अच्छा मकर करने वाला हूँ.
मकर माने धोका। जो अल्लाह इंसान के साथ धोका करता हे, वह अल्लाह कोई अच्छा अल्लाह नहीं होसकता."
पंडित जी आपने तो कुरआन की इस आयत का अनुवाद ही बड़ा धोकेवाला किया है।
किसी वाक्य का अर्थ उसके प्रसंग के अनुसार करना चाहिए। क्या इतना भी आप को नहीं मालूम?  कुरआन 3:54 के प्रसंग में शब्द 'मकर' का अर्थ है 'योजना' या 'तदबीर'। इसी कारण कुरआन के सारे अनुवादकों ने (गैर मुस्लिम अनुवादकों ने भी) इसके यही अर्थ किए हैं। अंग्रेजी अनुवादकों ने भी इसके अर्थ 'plan' या 'plot' के किए हैं। आयत का अर्थ यह हुआ की यहूदियों ने हज़रत ईसा को कष्ट पहुँचाने की खुफिया योजना बनाई और अल्लाह ने उनको बचाने की योजना बनाई और निसंदेह अल्लाह की योजना सब पर भारी है।
असल में आपके इस अरबी शब्द ‘मकर’ को हिन्दी का शब्द ‘मकर’ समझ लिया। यदि दो भाषाओं में समान उच्चारण (pronunciation) के दो शब्द हों, तो यह ज़रूरी नहीं कि उनका अर्थ भी समान हो। उदाहरण के लिए शब्द ‘गलीज़’ को लीजिए। उर्दू भाषा में इसका अर्थ है ‘नापाक’ या ‘गंदा’। लेकिन अरबी भाषा में ‘गलीज’ غلیظ का अर्थ होता है ‘दृढ़’। इसी प्रकार संस्कृत में ‘गो’ का अर्थ है ‘गाय’ लेकिन अङ्ग्रेज़ी में ‘गो’ (go) का अर्थ होता है ‘जाना’।
इसके अतिरिक्त पवित्र कुरआन के एक महत्वपूर्ण शब्दकोश, ‘मुफ़रदात अलकुरआन’ में ‘मकर’ (योजना) को दो प्रकार का बताया गया है।
1.    मकरे महमूद (अच्छी योजना)
2.    मकरे मज़मूम (बुरी योजना)
मुफ़रदात के रचेता (इमाम रागिब) ने मकरे महमूद (अच्छी योजना) की मिसाल यही सूरह आले इमरान की आयत 54 दी है। इसके अतिरिक्त सूरह 35 आयत 43 में ‘मकर’ शब्द के साथ ‘सय्यि` مَكْرَ السَّيِّئِ शब्द आया है, जिसके अर्थ होते हैं, बुरी तदबीर/योजना। यदि ‘मकर’ अपने आप में बुरा शब्द होता तो इसके साथ ‘सय्यि’ लगाना व्यर्थ होता। इस से साफ साबित होता है कि ‘मकर’ का अर्थ केवल योजना है और धोका, फरीब नहीं।
अरबी में यह शब्द कोई बुरा अर्थ नहीं रखता लेकिन हिंदी में बड़े घृणित अर्थों में बोला जाता हे जिसके कारण आपने आपत्ति की है.
वेद का धोकेबाज़ ईश्वर अपने शायद वेदों का अध्यन नहीं किया है। ऋग्वेद में अनेक जगह इन्द्र को मायी (धोकेबाज़) कहा गया हे। उदाहरण के तोर पर देखियह ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 11, मंत्र 7
मायाभिरिन्द्र मायिनं तवं शुष्णमवातिरः |
विदुष टे तस्य मेधिरास्तेषां शरवांस्युत तिर ||
"हे इन्द्रदेव! अपनी माया द्वारा आपने 'शुषण' को पराजित किया। जो बुद्धिमान आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें."
इस मंत्र का भावार्थ स्वामी दयानंद जी इस प्रकार करते हैं।
"बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्वर आगया देता है कि- साम, दाम, दंड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों क़ी निवृत्ति करके चक्रवर्ति राज्य क़ी यथावत उन्नति करनी चाहिए"
पंडित जी, साम, दाम, दंड और भेद को तो आप जानते ही होंगे.
साम : बहलाना फुसलाना
दाम : धन देकर चुप कराना
दंड : यदि बहलाने फुसलाने से न माने तो ताड़ना करना
भेद : फूट डालना
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद 4/16/9 में दयानन्द जी नें भी अपने भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद 'निकृष्ट बुद्धियुक्त' किया है। पंडित जयदेव शर्मा (आर्य समाजी) ने अपने ऋग्वेद भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद 'कुटिल मायावी' किया है। तो सिद्ध हो गया कि वैदिक ईश्वर मायी अर्थात धोकेबाज़ है।
पंडित जी आपके शब्दों में कहना चाहिए, "जो ईश्वर इंसान के साथ धोका करता है या इंसानों को धोके का उपदेश करता है, वह ईश्वर कोई अच्छा ईश्वर नहीं होसकता।"
प्रश्न 4
उत्तर
हज़रत नूह ने अल्लाह से दुआ मांगी की दुनिया वालों को मेरे दीन में करदे, अल्लाह ने कुबूल नहीं की। जब नाश होने की दुआ मांगी तो अल्लाह ने कुबूल की। इसका प्रमाण कृपया कुरआन से दीजियह कि ऐसी दुआ कहाँ मांगी?
أَفَلَمْ يَاْيْئَسِ الَّذِينَ آَمَنُوا أَنْ لَوْ يَشَاءُ اللَّهُ لَهَدَى النَّاسَ جَمِيعًا
यदि अल्लाह चाहता तो सारे ही मनुष्यों को सीधे मार्ग पर लगा देता? [सूरह राद 13; आयत 31]
यह सही अनुवाद है। इसका अर्थ आपने गलत किया है। अल्लाह ने सारे लोगों को मोहलत दी है एक निर्धारित समय तक। यह हम सब की परीक्षा है जिसमें हमें सत्य स्वीकार या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता है। जो व्यक्ती चाहे तो माने और जो चाहे न माने। अब अल्लाह के चाहने को आप मनुष्य के चाहने के सामान मत समझिए। यहाँ तो अल्लाह एक सिद्धांत बता रहे हैं कि यदि अल्लाह चाहते तो सारे इंसान आस्तिक बनजाते। उदाहरण के लिए यह धरती देखिए जो अल्लाह के निर्धारित नियमों के अनुसार अपना चक्कर लगा रही है। क्या धरती को यह स्वतंत्रता है कि वह अपने ग्रहपथ से बाहर निकले? नहीं। क्योंकि धरती में हमारी तरह स्वतंत्र इच्छा (free will) नहीं है।  तो यही बात हमें अल्लाह समझा रहे हैं। अल्लाह को हिन्दू मुस्लिम् लड़ाई देखना पसंद नहीं, लेकिन यह तो हमारी मूर्खता है कि हम लड़ते हैं, या आप जैसे लोग लड़वाते हैं। क्या आपके वैदिक ईश्वर को लड़ाई पसंद है जो वेदों के हर प्रष्ट पर लड़ाई का कोई न कोई मंत्र है?
अब सूरह नूह 71; आयत 26-28 पर आते हैं जिसका मैं सही अनुवाद आपके सामने कर दूं क्योंकि आपको गलत तर्जुमा करने की आदत है
وَقَالَ نُوحٌ رَبِّ لَا تَذَرْ عَلَى الْأَرْضِ مِنَ الْكَافِرِينَ دَيَّارًا
और नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! धरती पर इनकार करनेवालों में से किसी बसने वाले को न छोड़
إِنَّكَ إِنْ تَذَرْهُمْ يُضِلُّوا عِبَادَكَ وَلَا يَلِدُوا إِلَّا فَاجِرًا كَفَّارًا
यदि तू उन्हें छोड़ देगा तो वे तेरे बन्दों को पथभ्रष्ट कर देंगे और वे दुराचारियों और बड़े अधर्मियों को ही जन्म देंगे
رَبِّ اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِمَنْ دَخَلَ بَيْتِيَ مُؤْمِنًا وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَلَا تَزِدِ الظَّالِمِينَ إِلَّا تَبَارًا
ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मेरे माँ-बाप को भी और हर उस व्यक्ति को भी जो मेरे घर में ईमानवाला बन कर दाख़िल हुआ और (सामान्य) ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को भी (क्षमा कर दे), और ज़ालिमों के विनाश को ही बढ़ा।"
पंडित जी, यह प्रार्थना तो उन पापियों को नष्ट करने के लिए थी जिन का पाप हद से बढ़ गया था और ईमानवालों (अर्थात जो भले लोग हों) को बचाने की प्रार्थना है। इसमें आपको स्वार्थ कैसे नज़र आया? यदि अल्लाह उन पापी काफिरों (अल्लाह के भले मार्ग पर न चलने वाले) को नष्ट नहीं करता तो वे दुनिया में पाप को फैलाते जैसा कि आयत 27 से ज़ाहिर है। दुराचारियों को नष्ट करने और सदाचारियों की रक्षा करने की प्राथना करना कोनसी स्वार्थपरता है?
वेदों की स्वार्थी प्रार्थनाएं
किं ते कर्ण्वन्ति कीकटेषु गावह नाशिरं दुह्रे न तपन्तिघर्मम |
आ नो भर परमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्रन्धया नः ||
हे इन्द्र, अनार्य देशों के कीकट वासियों की गौओं का तुम्हे क्या लाभ है? उनका दूध सोम में मिला कर तुम पी नहीं सकते। उन गौओं को यहाँ लाओ। परमगन्द (उनके राजा), की संपत्ति हमारे पास आजाए। नीच वंश वालों का धन हमें दो। [ऋग्वेद 3/53/14]
पंडित जी, यह अनार्यों के धन और संपत्ति को लूटने की कैसी प्राथना वेदों में की गई है?
'कीकट' शब्द की व्याख्या करते हुए यास्क आचार्य ने 'निरुक्त' में लिखा है,
कीकटा नाम देशो अनार्यनिवासः [निरुक्त 6/32]
अर्थात कीकट वह देश है जहां अनार्यों का निवास है। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आर्यसमाजी विद्वान पं. राजाराम शास्त्री ने लिखा है- "कीकट अनार्य जाती थी, जो बिहार में कभी रहती थी, जिस के नाम पर बिहार का नाम कीकट है." (निरुक्त, पृ। 321, 1914 ई.)
स्वामी दयानंद ने 'कीकटाः' का अर्थ करते हुए लिखा है-
"अनार्य के देश में रहने वाले मलेच्छ "
तो पंडित जी अब आप ही फेसला कीजिए कि यह दूसरों का धन लूटने की स्वार्थी प्रार्थना है या नहीं।  मैंने केवल एक उदाहरण दिया अन्यथा ऐसी स्वार्थी प्रार्थनाओं के अतिरिक्त वेदों में कुछ और है भी नहीं।
प्रश्न 5
उत्तर
पंडित जी, आपके इस प्रश्न का न तो सर है न पैर। जिस आयत पर आप प्रश्न कर रहे हैं ऐसी पवित्र शिक्षा आपको सारे वैदिक शास्त्रों में नहीं मिले गी। आयत तो आपने कुछ ठीक लिखी है लेकिन इस से गलत बात साबित करने की कोशिश की है। सुनिए आयत का सही अनुवाद-
وَمِنْ آيَاتِهِ أَنْ خَلَقَ لَكُمْ مِنْ أَنْفُسِكُمْ أَزْوَاجًا لِتَسْكُنُوا إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُمْ مَوَدَّةً وَرَحْمَةً
"और यह भी अल्लाह की निशानियों में से है कि उसने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उसके पास शान्ति प्राप्त करो। और उसने तुम्हारे बीच प्रेंम और दयालुता पैदा की" [सूरह रूम 30; आयत 21]
निश्चय, पति पत्नी के बीच में प्रेम और दयालुता अल्लाह ने ही डाली हैं। लेकिन उस प्रेम और हमदर्दी की क़दर करना हम पर निर्भर है। अल्लाह ने मां और बच्चे के बीच में भी अपार प्रेम डाला है, लेकिन किसी समय मां को अपने बच्चे के साथ दृढ़ता से पेश आना पड़ता है जब बच्चा गलती करता है। मां और बच्चे का रिश्ता एक प्राकृतिक रिश्ता है, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता बनाया जाता है। आप अपनी ही मिसाल लीजिए। आज आप आर्य समाज के सदस्य हैं। हो सकता है कल आप इस्लाम के अनुयायी बन जाएं।
तो निश्चय ही पति-पत्नी के रिश्ते में अल्लाह ने प्रेम और हमदर्दी डाली होती है, परन्तु केवल वही इस प्रेम और हमदर्दी का अनुभव कर सकते हैं जो एक दुसरे से संतुष्ट हों और एक दुसरे के स्वभाव को समझते हों। इस आयत का तलाक़ के विधान के साथ कोई सम्बन्ध नहीं.
तलाक़ का विधान अवश्य कुरआन में है और कुरआन से ही प्रभावित हो कर हिन्दू समाज ने भी अपना लिया है। कुरआन में तो एक पूरा अध्याय तलाक़ के विधान पर है जिसको सूरह तलाक़ (सूरह 65) कहा जाता है। तलाक़ का विधान बिलकुल प्राकृतिक है। यदि पति-पत्नी के बीच में अन्य कारण प्रेम और हमदर्दी पर हावी होजाएं तो तलाक़ बिलकुल प्राकृतिक है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि किसी भी कारण के बगैर पति अपनी पत्नी को तलाक़ दे। कुरआन के अनुसार तलाक़ एक गंभीर मामला है जो गंभीर स्थितिओं में पेश आता है। मगर इस अत्यंत भावुक मामले में भी शालीनता और सद्व्यवहार पर कायम रहने का हुक्म दिया गया है। 
जिस आयत को आपने अधूरा पेश किया है और उसका अनुवाद भी सरासर गलत किया है, पहले में वह पाठकों के सामने रख दूं-
الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَأْخُذُوا مِمَّا آتَيْتُمُوهُنَّ شَيْئًا إِلَّا أَنْ يَخَافَا أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَنْ يَتَعَدَّ حُدُودَ اللَّهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ [٢:٢٢٩
"तलाक़ दो बार है। फिर सामान्य नियम के अनुसार (स्त्री को) रोक लिया जाए या भले तरीक़े से विदा कर दिया जाए। और तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो, उसमें से कुछ ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को डर हो कि अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे तो यदि तुमको यह डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओ पर क़ायम न रहेंगे तो स्त्री जो कुछ देकर छुटकारा प्राप्त करना चाहे उसमें उन दोनो के लिए कोई गुनाह नहीं। यह अल्लाह की सीमाएँ है। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो ऐसे लोग अत्याचारी है" [सूरह बक़रह; आयत 229]
पंडित जी, आपने जो प्रश्न इस आयत पर किया है वैसा कुछ भी इस आयत में है ही नहीं। उल्टा इस आयत में तलाक़ देने का सही ढंग सिखाया गया है और वह यह है कि पत्नी की पवित्रता की अवस्था में पति एक तलाक़ दे। इसके बाद तीन मासिक धर्म (three menstrual cycles ), जो इद्दत का समय है, बीतने पर पति-पत्नी का सम्बन्ध टूट जाएगा और वही स्त्री किसी दुसरे से विवाह कर सकेगी। तीन महीने के अंतराल में यदि ये फिर से वापस आना चाहें तो आ सकते हैं।
यह एक वापस ली जाने वाई तलाक़ है। ऐसी तलाक़ केवल दो बार हो सकती है, जिस का ढंग यह है-
१। यदि पति तलाक़ दे तो इद्दत (तीन मासिक धर्म अर्थात तीन महीने) के अन्दर रुजूअ हो सकता है। यदि इद्दत बीत जाए और रुजू न करे तो नए महर के साथ ही नया निकाह संभव है। यदि इस निकाह के बाद फिर किसी कारण से तलाक़ होजाए तो निश्चित इद्दत के अन्दर वे रुजूअ कर सकते हैं। यदि यह इद्दत भी बीत जाए तथा रुजू न करें तो नए महर के साथ ही नया विवाह हो सकता है।
२। परन्तु यदि फिर तीसरी बार तलाक़ दे तो यह तलाक़ अंतिम होगी। अब वे इद्दत के अन्दर रुजूअ नहीं कर सकते और ना ही इद्दत के बाद नए महर के साथ नया विवाह हो सकता है। हाँ, यदि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से विवाह करले और वह पति स्वयं मर जाए या उसे तलाक़ दे, तो ही पहले पति से फिर विवाह संभव है और वह भी ज़बरदस्ती नहीं। लेकिन यहाँ एक बात का ध्यान दें कि दूसरा पति किसी निर्धारित योजना के अधीन स्त्री को तलाक़ दे ताकी वह स्त्री पहले पति से विवाह कर सके, यह इस्लाम में हराम है और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने फरमाया है कि ऐसे पुरुष पर अल्लाह का अभिशाप (लानत) है। जिस हलाला की आप बात कर रहे हैं वह इस्लाम में जायज़ है ही नहीं।
यहाँ प्रश्न यह है कि जो पति अपनी पत्नी को परेशान करने के लिए तीन बार तलाक दे चूका ऐसे पुरुष से वह स्त्री फिर से विवाह क्यों करे गी?  कुरआन तो पहले ही बता चूका है कि पति-पत्नी का रिश्ता पवित्र रिश्ता होता है जिस में प्रेम और हमदर्दी हो। अगर पति-पत्नी की आपस में नहीं बनती तो पहले मामला बात चीत से हल करना चाहिए। यदि समस्या हल हो जाए तो ठीक और यदि लगे कि तलाक़ के सिवा कोई और रास्ता नहीं तब ही उसका उपयोग करना चाहिए। लिहाज़ा हलाला जैसी बुरी चीज़ की कोई अवधारणा इस्लाम में नहीं। यह केवल इंडिया, पाकिस्तान और बंगलादेश में मुसलमानों की अज्ञानता की समस्या है। इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं।
३। इस आयत ने स्पष्ट कर दिया कि तलाक़ हमेशा अहसन (भले तरीक़े से) हो। स्त्री को जो महर दिया हो उसको वापस नहीं लेना चाहिए क्योंकि उस पर स्त्री का अधिकार है। यदि पति अपनी पत्नी को परेशान करने के लिए तलाक़ के हरबे इस्तेमाल कर रहा हो तो पत्नी को चाहिए कि वह न्यायाले के पास जाए और सामान्य नियम के अनुसार उस पति से अलग हो जाए.

हिन्दू धर्म और तलाक़
हिन्दू विवाह अधिनियम,1955 के अनुसार विशेष स्थितियों में, यथा दुष्ट स्वभाव, मूर्ख, व्यभिचारी, नामर्द होने पर स्त्री अपने पति को तलाक़ दे सकती है। लेकिन हिन्दू धर्म में तलाक़ का कोई प्रावधान नहीं है। इस्लाम से ही प्रभावित होकर हिन्दू समाज ने भी तलाक केपरवधान को अपना लिया। पति चाहे दुष्ट स्वभाव वाला, मूर्ख, और रोगी हो तब भी हिन्दू धर्म के अनुसार स्त्री उसे नहीं छोड़ सकती। उसे अपने ही पति के साथ जीना और मरना है।
नियोग प्रथा 
पंडित जी आप ने हलाला की गैर इस्लामी अवधारणा पर तो प्रश्न किया लेकिन अपने वैदिक धर्म की मूल शिक्षा 'नियोग' को भूल गए। नियोग के नाम पर अपनी पत्नी को अन्य पुरुषों से बे आबरू कराना, यह आपकी वैदिक सभ्यता है जिसे आप इस्लाम पर लादने का प्रयास कर रहे हैं। नियोग प्रथा के अनुसार नारी को न केवल निम्न और भोग की वस्तु और नाश्ते की प्लेट समझा गया है बल्कि बच्चे पैदा करने की मशीन बनाया गया है। और 'नियोग' का कारण भी क्या निराला है! केवल एक पुरुष के संतान उत्पन्न करने के लिए 'नियोग' का घटिया प्रावधान वैदिक धर्म में है। नियोग पर मेरी टिपण्णी के लिए देखियह प्रश्न 15 का उत्तर.
प्रश्न 6
उत्तर
यहाँ आप काफिरों को क़त्ल करने पर आपत्ति कर रहे हैं, लेकिन आपने तो उन आयातों का ऐतिहासिक संदर्भ समझा ही नहीं। जो आयत आप पेश कर रहे हैं उसका आपने अनुवाद गलत किया है और हवाला भी गलत है। सही हवाला सूरह बक़रह की आयत 193 है जिसका सही अनुवाद यह है,
وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ انْتَهَوْا فَلَا عُدْوَانَ إِلَّا عَلَى الظَّالِمِينَ
अर्थात तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई क़दम उठाना ठीक नहीं [सूरह बक़रह; आयत 193 और सूरह अन्फाल; आयत 31]
पंडित जी, उस व्यक्ति को क्या कहें जो एक वाक्य को उसके प्रसंग में न देखे? इस आयत का सही अर्थ जानने के लिए आयत 191 से पढ़िए
وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ
और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़े, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता
وَاقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُمْ مِنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَاتِلُوهُمْ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَاتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِنْ قَاتَلُوكُمْ فَاقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ
और जहाँ कहीं उनपर क़ाबू पाओ, क़त्ल करो और उन्हें निकालो जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है, इसलिए कि फ़ितना (उत्पीड़न) क़त्ल से भी बढ़कर गम्भीर है। लेकिन मस्जिदे हराम (काबा) के निकट तुम उनसे न लड़ो जब तक कि वे स्वयं तुमसे वहाँ युद्ध न करें। अतः यदि वे तुमसे युद्ध करें तो उन्हें क़त्ल करो - ऐसे इनकारियों का ऐसा ही बदला है
فَإِنِ انْتَهَوْا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ
फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह भी क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ انْتَهَوْا فَلَا عُدْوَانَ إِلَّا عَلَى الظَّالِمِينَ
तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई क़दम उठाना ठीक नहीं
इन आयतों से पता चलता हे कि यह युद्ध धार्मिक अत्याचार का अंत करने के लिए लड़ा जारहा था। क्योंकि आयत 191 और 192 में स्पष्ट लिखा है कि यह लड़ाई केवल उनसे थी जो मुसलमानों पर उनके धर्म के कारण अत्याचार कर रहे थे। मक्का में 13 वर्ष तक मुसलमान मूर्ति पूजकों का अत्याचार सहते रहे और उसके बाद उन्हें वहाँ से निकल कर मदीना जाना पड़ा। मदीना में आने के बाद भी मूर्ति पूजकों ने उन्हें शान्ति से बेठने नहीं दिया, और युद्ध के लिए मजबूर किया। इसी प्रसंग में आयत 193 को देखना चाहिए। इस आयत में अरबी शब्द 'फ़ितना' का अर्थ 'धार्मिक अत्याचार' है जिसका अंत इस्लाम ने किया। 'अल्लाह के लिए दीन होजाने' का अर्थ यह है कि मज़हबी आज़ादी (धार्मिक स्वतंत्रता) होजाए। तो इस आयत पर आपके आक्षेप का कोई आधार नहीं है.
इसके अतिरिक्त कुरआन में जो भी आयतें काफिरों को मारने के लिए आई हैं वे सब युद्ध की स्थितियों से सम्बंधित आयतें हैं। इसकी व्याख्या मैंने प्रश्न 1 के उत्तर में करदी है.
वेदों की निर्दयी शिक्षा
वेदों के वचन भी सुनिए
"धर्म के द्वेषी शत्रुओं को निरन्तर जलाइए।... नीची दशा में करके सूखे काठ के समान जलाइए." [यजुर्वेद 13/12 दयानन्द भाष्य]
“हे, तेजस्वी विद्वान पुरुष।... धर्म के अनुकूल होके दुष्ट शत्रुओं को ताड़ना दीजिए...शत्रुओं के भोजन के और अन्य व्यवहार के स्थान को अच्छे प्रकार प्रकार विस्तारपूर्वक नष्ट कीजिये और शत्रुओं को बल के साथ मारिए...” [यजुर्वेद मंत्र 13] इसके विपरीत इस्लाम हमें यह शिक्षा देता है कि युद्ध में भी खाद्य पदार्थों को नष्ट नहीं करना चाहिए और वृक्षों को नहीं जलाना चाहिए।
“हे वीर पुरुष। जैसे हम लोग जो शस्त्र-अस्त्र वैरी की कामनाओं को नष्ट करता है, उस धनुष आदि शस्त्र-अस्त्र विशेष से प्रथिवियों को और उक्त शस्त्र विशेष से संग्राम को जीते...” [यजुर्वेद अध्याय 29, मंत्र 39] यहाँ तो वैदिक धर्मी सारी प्रथिवि को शास्त्रों से जीतने का सपना देख रहे हैं।
इस्लाम ने हमें युद्ध का यह सिद्धांत सिखाया है कि युद्ध में कभी भी स्त्रियॉं, बच्चों और बूढ़ों की हत्या नहीं करनी चाहिए। लेकिन इसके विपरीत वेद यह शिक्षा देते हैं कि अपने शत्रुओं के गोत्रों और परिवार की बेदर्दी से हत्या करो। सुनिए,
“तुम लोग अपने शरीर और बुद्धि वा बल वा सेनजनों से जो कि शत्रुओं के गोत्रों अर्थात समुदायों को चिन्न-भिन्न करता, उनकी जड़ काटता, शत्रुओं की भूमि को ले लेता, अपनी भुजाओं में शास्त्रों को रखता, अच्छे प्रकार शत्रुओं को मारता, जिससे वा जिसमें शत्रुओं को पटकते हैं, उस संग्राम में वैरियों को जीत लेता और उनको विदीर्ण करता, इस सेनापति को प्रोत्साहित करो और अच्छे प्रकार युद्ध का आरम्भ करो।” [यजुवेद 17/38, दयानन्द भाष्य]
स्वामी दयानन्द सरस्वती ऋग्वेद 1/7/4 के भावार्थ में लिखते हैं
"परमेश्वर का यह स्वभाव है कि युद्ध करने वाले धर्मात्मा पुरुषों पर अपनी कृपा करता है और आलसियों पर नहीं। जो मनुष्य जितेन्द्रिय विद्वान आलस्य को छोड़े हुए बड़े बड़े युद्धों को जीत के प्रजा को निरंतर पालन करते हैं, वह ही महाभाग्य को प्राप्त होके सुखी रहते हैं."
क्या आपके ईश्वर के जिम्मे यही काम रह गया है कि लोगों को एक दुसरे से लड़ने का आदेश देता रहे? तो उस ईश्वर का भक्त कैसा होगा? प्रमाण है बोद्धों, जैनियों और अन्य नास्तिक समुदायों पर हिन्दुओं के अत्याचार जो इतिहास से साबित होते हैं। इन अत्याचारों के बारे में स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश' में आदि शंकराचार्य के सन्दर्भ में संक्षेप में लिखा है.
"दस वर्ष के भीतर सर्वत्र आर्यावर्त में शंकराचार्य ने घूम कर जैनियों का खंडन और वेदों का मण्डन किया। परन्तु शंकराचार्य के समय में जैन विध्वंस अर्थात जितनी मूर्तियाँ जैनियों की निकलती हैं। वे शंकराचार्य के समय में टूटी थीं और जो बिना टूटी निकलती हैं वे जैनियों ने भूमि में गाड दी थीं की तोड़ी न जाएँ। वे अब तक कहीं भूमि में से निकलती है।" [सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 11]
पंडित जी देखिए जैनियों पर कितना अत्याचार किया था हिन्दुओं  ने। उनकी मूर्तियाँ भी तोड़ डाली थीं।
प्रश्न 7
उत्तर
إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ
निस्संदेह नमाज़ अश्लीलता और बुराई से रोकती है। [सूरह अन्कबूत 29; आयत 45]
आप यह प्रश्न कर रहे हैं कि यदि नमाज़ बुराई से रोकती है तो नमाज़ पढने वाले ही बुराई क्यों कर रहे हैं? नमाज़ से यहाँ केवल उसका प्रकट रूप तात्पर्य नहीं है। बल्कि नमाज़ की आंतरिक भावना तात्पर्य है। जो व्यक्ति हकीकी नमाज़ पढ़ रहा हो, जिस में वह पूरे ध्यान के साथ अपने आप को अल्लाह के सामने महसूस कर रहा हो, वही वास्तविक नमाज़ होगी। जो व्यक्ति नमाज़ ध्यान से नहीं पढ़ते उनके बारे में तो कुरआन स्पष्ट कहता है कि वह नमाज़ अल्लाह स्वीकार नहीं करते। सुनिए-
فَوَيْلٌ لِلْمُصَلِّينَ
अतः तबाही है उन नमाज़ियों के लिए,
الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ
जो अपनी नमाज़ से ग़ाफिल (असावधान) हैं, [सूरह माऊन 107; आयत 4-5]
इस से सिद्ध होता है कि जो व्यक्ति नमाज़ पढ़ के भी बुराई करे वह वास्तव में केवल प्रकट रूप से नमाज़ पढता है, आतंरिक भावना से नहीं.
प्रश्न 8
उत्तर
यह एक आपका निराला प्रश्न है। मुझे तो इसका उत्तर देते हुए भी शर्मिंदगी हो रही है। कुरआन में नरक से मुक्ति और स्वर्ग की प्राप्ति के 4 सिद्धांत बतायह गए हैं। जो व्यक्ति इस मापदंड पर पूरा उतरे गा, वही नरक से बच जाए गा। कुरआन में आता है-
وَالْعَصْرِ
गवाह है गुज़रता समय
إِنَّ الْإِنْسَانَ لَفِي خُسْرٍ
कि वास्तव में मनुष्य घाटे में है,
إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की ताकीद की, और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की। [सूरह अल-असर 103; आयत 1-4]
जो व्यक्ति भी इस कसौटी पर पूरा उतरे गा वह नरक से बच्च कर स्वर्ग प्राप्त करेगा। आपको अरब वालों की खुशहाली से क्यों जलन हो रही है? इस खुशहाली को ऐश कहना आपकी मूर्खता है। यदि कोई अरबी हकीकत में ऐश और विलासिता में अल्लाह से गाफिल होगया हो तो वह निश्चित रूप से उसका दण्ड भोगे गा। मगर सारी अरबी जनता को एक ही लाठी से हांकना आपकी नस्लवादी मानसिकता को व्यक्त करता है। वास्तव में एष करने की आदत आपके वैदिक ऋषियों को थी। तभी तो हमेशा ईश्वर से दुनियावी सुख और एष की प्रार्थनाएँ करते थे। खुद शब्द ‘वेद’ के अर्थ धन और संपत्ति के भी हैं जैसा कि ऊपर उत्तर 4 में ऋग्वेद 3/53/4 में आए शब्द परमगन्दस्य वेदो (परमगन्द की धन संपत्ति) से साबित है। वेद के लेखकों का उद्देश ही मंत्र जप के धनद दौलत पाना और एष करना था। जहां पवित्र कुरआन अल्लाह की स्तुति और हिदायत की प्रार्थना से शुरू होता है, वहीं ऋग्वेद अग्नि की स्तुति कर धन और रत्न प्राप्त करने से शुरू होता है। इसी लिए वहाँ लिखा हैरत्नधातमम अर्थात 'रत्नों से विभूषित करने वाला'।
इसके अतिरिक्त आपका यह कहना कि कुरआन  में अल्लाह ने कहा कि मुसलमानों पर जहन्नुम की आग हराम है, इसका प्रमाण दिखाइए? कुरआन में केवल नाम के मुसलमान को जहन्नुम से मुक्ति नहीं दी गयी है, बल्कि एक सच्चे मुसलमान को, जो अच्छे कर्म करता हो और दूसरों को सत्य की ताकीद करता हो, और दूसरों को धैर्य की ताकीद करता हो। इन बातों में कोई विरोध नहीं।
प्रश्न 9
उत्तर
पंडित जी, यदि आप ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र को देख लेते तो यह बेजा आपत्ति नहीं करते। ध्यान से सुनिए-
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं रत्वीजम |
होतारं रत्नधातमम ||
"हम लोग उस अग्नि की प्रशंसा करते हैं जो पुरोहित है, यज्ञ का देवता, समस्त तत्वों का पैदा करने वाला, और याजकों को रत्नों से विभूषित करने वाला है"
बताइए, यदि अग्नि से, आपके के अनुसार, ईश्वर ही तात्पर्य है और वेद भी ईश्वर की वाणी है, तो इस वाक्य का बोलने वाला कोन है?
आप असल में ईश्वरीय पुस्तकों कि जुबान/भाषा से अपरिचित हैं। ईश्वरीय किताबों का मुहावरा और कलाम (भाषा) कि शैली कई प्रकार की होती है। कभी तो ईश्वर स्वयं बात कहने के रूप में अपना आदेश स्पष्ट करता है (संस्कृत का उत्तम पुरुष/first person) और कभी गायब से (संस्कृत का प्रथम पुरुष/third person)। कभी कोई ऐसे वाक्य जो दुआ, स्तुति या प्राथना के रूप में बन्दों को सिखाना अपेक्षित हो उसे बन्दे की जुबान से व्यक्त कराया जाता है।
सूरह फातिहा या बिस्मिल्लाह भी इसी प्रकार है। अर्थात यह ऐसे शब्द हैं जो ईश्वर बन्दों को सिखातें हैं। तो कुरआन कलामुल्लाह ही है। आप कलाम कि शैली को न समझने के कारण ऐसी आपत्ति कर रहे हैं। इस प्रश्न का निर्णायक उत्तर मैं पंडित जी के गुरु के घर से ही दिखा देता हूँ ताकि सारी दुनिया इनके दोहरे मापदंड देख लें। स्वामी दयानन्द के शास्त्रार्थ और विभिन व्याख्यानों पर आधारित एक पुस्तक है जिसका नाम है ‘दयानन्द शास्त्रार्थ संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’। यह पुस्तक आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट देहली ने प्रकाशित की है। इस पुस्तक केअध्याय 38 में पंडित ब्रिजलाल साहब के स्वामी दयानन्द जी से किए गए प्रश्न मिलते हैं। पंडित ब्रिजलाल के स्वामी जी से किए गए कई प्रश्नों में से एक प्रश्न यह है।
प्रश्न 21: वेद में परमेश्वर की स्तुति है तो क्या उसने अपनी प्रशंसा लिखी?
उत्तर- जैसे माता पिता अपने पुत्र को सिखाते हैं कि माता, पिता और गुरु की सेवा करो, उनका कहना मानो। उसी प्रकार भगवान ने सिखाने के लिए वेद में लिखा। [दयानन्द शास्त्रार्थ संग्रह तथा विशेष शंका समाधान’, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट देहली, पृष्ट 79, जून 2010 प्रकाशन]
यह देखिए कैसे स्वामी दयानन्द जी स्वयं पंडित महेंद्रपाल आर्य के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। जब यह लोग वेद पढ़ते हैं तो समाधान की ऐनक लगाते हैं, लेकिन कुरआन पढ़ते समय शंका की ऐनक लगाते हैं। ऐसे हठधर्मी लोगों को इनही उदाहरणों से समझाना पढ़ता है।

क्या वेद ईश्वर् की वाणी है?



आर्य समाज का यह दावा कि वेद ईश्वर् की वाणी है, या एक इल्हामी ग्रन्थ है, पूरी तरह से गलत है। वेदों का अध्यन करने से पता चलता है कि वे ऋषियों द्वारा बनायह गए हैं। इस विषय का पूरा विवरण करना यहाँ संभव नहीं है, लेकिन में कुछ प्रमाण आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ-
तैतीरीय ब्रह्मण 2/8/8/5  में लिखा है
ऋषयो मंत्रकृतो मनीषिण:
अर्थात "बुद्धिमान ऋषि मन्त्रों के बनाने वाले हैं."
इसके अतिरिक्त इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं समय समय पर वेदों के नए नए मंत्र बनते रहे हैं और वे पहले बने संग्रहों (संहिताओं अथवा वेदों) में मिलाये जाते रहे हैं। खुद वेदों में ही इस बात के प्रमाण मिलते हैं-
ऋग्वेद 1/109/2
अथा सोमस्य परयती युवभ्यामिन्द्राग्नी सतोमं जनयामि नव्यम ||
अर्थात "हे इन्द्र और अग्नि, तुम्हारे सोम्प्रदानकाल में पठनीय एक नया स्तोत्र रचता हूँ."
ऋग्वेद 4/16/21
अकारि ते हरिवह बरह्म नव्यं धिया
अर्थात "हे हरि विशिष्ठ इन्द्र, हम तुम्हारे लिए नए स्तोत्र बनाते हैं.
ऋग्वेद 9/9/8
नू नव्यसे नवीयसे सूक्ताय साधया पथः |
परत्नवद रोचया रुचः ||
सोम तुम नए और स्तुत्य सूक्त के लिए शीघ्र ही यज्ञ-पथ से आओ और पहले की तरह दीप्ति का प्रकाश करो।
ऋग्वेद 7/22/9
ये च पूर्व ऋषयो ये च नूत्ना इन्द्र बरह्माणि जनयन्त विप्राः |
अर्थात "हे इन्द्रदेव, प्राचीन एवं नवीन ऋषियों द्वारा रचे गए स्तोत्रों से स्तुत्य होकर आपने जिस प्रकार उनका कल्याण किया, वैसे ही हम स्तोताओं का मित्रवत कल्याण करें."
स्पष्ट है कि इन नए स्तोत्रों व मन्त्रों व सूक्त के रचेता साधारण मानव थे, जिन्होंने पूर्वजों द्वारा रचे मन्त्रों के खो जाने पर या उनके अप्रभावकारी सिद्ध होने पर या उन्हें परिष्कृत करने या अपनी नयी रचना रचने के उद्देश से समय समय पर नए मंत्र रचे।
इसलिए वेद सर्वज्ञ परमात्मा की रचना सिद्ध नहीं होते।
प्रश्न 10
उत्तर
आपने जो हदीस पेश की है उसमें तो लड़ाई की कोई बात ही नहीं कही गयी है। आपने इस बड़ी स्पष्ट हदीस पर अनावश्यक आपत्ति की है। शायद इसमें 'जिहाद' का शब्द देखकर आपने यह समझ् लिया कि यहाँ दुसरे लोगों से लड़ाई को सब से बड़ा काम कहा गया है। यह केवल आपकी अज्ञानता है कि आप जिहाद के सही अर्थ को नहीं समझे।
जिहाद का शाब्दिक अर्थ 'संघर्ष' है। इस अर्थ को यदि आपकी दी हुई हदीस में अपनाएं तो हदीस का अर्थ यह हुआ कि अल्लाह की राह में 'संघर्ष' करना सबसे बड़ा काम है। इस पर आपको क्या आपत्ति है? क्या आप अपने धर्म के प्रचार में संघर्ष नहीं करते? क्या आप अपनी सोच के अनुसार ईश्वर के मार्ग में संघर्ष नहीं करते? अल्लाह का मार्ग तो एक पवित्र मार्ग है। इस मार्ग के प्रचार में और बुरे मार्ग की निंदा में तो हर ज़माने में संघर्ष करना पड़ता है। क्या आपको यह भी मालूम नहीं, जो आपने इसकी तुलना लड़ाई से की? इसकी तुलना आप श्री कृष्ण के उस उपदेश से कीजियह जब उन्होंने अर्जुन से कहा-
"हे पार्थ, भाग्यवान क्षत्रियगण ही स्वर्ग के खुले द्वार के सामने ऐसे युद्ध के अवसरको अनायास प्राप्त करते हैं। दूसरी और, यदि तुम धर्मयुद्ध नहीं करोगे, तो स्वधर्म एवं कीर्ति को खोकर पाप का अर्जन करोगे." [श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २; श्लोक ३२-३३]
कहिए पंडित जी, क्या कृष्ण लड़ाकू है, जो दुनिया वालों को लड़ाना चाहते हैं? आदरणीय पाठको, नीचे मेने महेंद्रपाल जी का एक विडियो लिंक रखा है, जिस में वे हिन्दुओं को श्री कृष्ण के यही वाक्य सुना कर लड़ने पर उकसा रहे हैं। आप ही फेसला कीजिए कि कोन लड़ाकू है।
प्रश्न 11


उत्तर
ऐसी कोई हदीस नही जिसमें यह कहा गया हो कि गैर मुस्लिम की अर्थी देखने के समय उसे हमेशा के लिए जहन्नुम की आग में दाल देने की प्रार्थना की जाए। यह कोरा झूठ है। आपने हदीस का सही हवाला भी नहीं दिया है। इस कारण आपका प्रश्न ही निराधार है। यदि आपने हदीसों का अध्यन किया होता तो आपको ज्ञान होता कि एक गैर मुस्लिम की अर्थी (जनाज़ा) देखते समय पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने क्या किया था। सुनिए-
النبي صلى الله عليه وسلم مرت به جنازة فقام فقيل له إنها جنازة يهودي‏.‏ فقال ‏" أليست نفسا؟" ...إذا رأيتم الجنازة فقوموا
"एक बार पैगम्बर (सल्ल.) के सामने से एक अर्थी पारित हुई तो आप (सल्ल.) खड़े होगए। आपसे कहा गया कि यह तो एक यहूदी की अर्थी है। पैगम्बर (सल्ल.) ने फरमाया, "क्या यह इंसान नहीं? ...जब भी तुम लोग जनाज़े को देखा करो तो खड़े हो जाया करो." [सही बुखारी; किताबुल जनाइज़; हदीस 389 और 390]
अब बताइए, कि नबी (सल्ल.) के इस पवित्र आचरण के बाद भी आपको कोई शंका है? अल्लाह ने कोई भेद-भाव पैदा नहीं किया। कुरआन तो स्पष्ट कहता है।
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُمْ مِنْ ذَكَرٍ وَأُنْثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
"ऐ लोगो! हमने तुम्हें पुरुष और स्त्री से पैदा किया और तुम्हें कई दलों तथा वंशों में विभाजित कर दिया है, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। वास्तव में तुममें से अल्लाह के निकट सत्कार के अधिक योग्य वही है, जो सबसे बढकर संयमी है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला ह." [सूरह हुजुरात 49; आयत 13]
इस आयत से यह सिद्ध होता है कि जातियां एवं संतति केवल परिचय के लिए हैं। जो व्यक्ति उन्हें गर्व तथा स्वाभिमान का साधन बनाता है, वह इस्लाम के विरुद्ध आचरण करता है.
वैदिक ईश्वर का भेद-भाव
विश्व के धर्मों में हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है जिस में सामाजिक भेद-भाव के बीज शुरू से ही विद्यमान रहे हैं। हिन्दू धर्म सामाजिक भेद भाव को न केवल धर्म द्वारा अनुमोदित करता है, बल्कि इस धर्म का प्रारंभ ही भेद भाव के पाठ से होता है। हिन्दू धर्म ने शुरू से ही मानव मानव के बीच भेद किया। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त ने स्पष्ट कहा कि "ब्राह्मण परमात्मा के मुख से, क्षत्रिय उस कि भुजाओं से, वैश्य उस के उरू से तथा शूद्र उस के पैरों से पैदा हुए."
बराह्मणो.अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कर्तः |
ऊरूतदस्य यद वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ||
[ऋग्वेद 10/90/12]
हिन्दू बच्चे के जन्म के साथ ही भेद-भाव का दूषित जीवाणु उस से जुड़ जाता है जो उस के मरने के बाद भी उस का पिंड नहीं छोड़ता। जन्म के दुसरे सप्ताह बच्चे के नामकरण का आदेश है। नाम रखते ही उसे भेद-भाव कि घुट्टी पिला दी जाती है। सुनिए-
"ब्रह्मण का नाम मंगलसूचक शब्द से युक्त हो, क्षत्रिय का बल्सूचक शब्द से युक्त हो, वैश्य का धव्वाचक शब्द से युक्त हो और शूद्र का निंदित शब्द से युक्त हो."
"ब्राह्मण के नाम के साथ 'शर्मा', क्षत्रिय के साथ रक्शायुक्त शब्द 'वर्मा' आदि,वैश्य के नाम के साथ पुष्टि शब्द से युक्त 'गुप्त' आदि तथा शूद्र के नाम के साथ 'दास' शब्द लगाना चाहिए." [मनुस्मृति 2/31-32]
यदि में भेद-भाव के विषय पर सारे हिन्दू धर्मशास्त्रों की शिक्षा यहाँ लिख दूं तो एक बड़ी पुस्तक बन जाए गी। इसी कारण इस निम्नलिखित वचन पर ही उत्तर समाप्त करता हूँ। सुनिए-
"सजातियों के रहित शूद्र से, ब्राह्मण शव का वाहन कभी न करना। क्योंकि शुदा स्पर्श से दूषित शव की आहूति, उसको स्वर्ग्दायक नहीं होती." [मनुस्मृति 5/104]
पंडित जी, यदि आपके शव को कभी शूद्र का स्पर्श लग गया तो आपको अपने धर्म से हाथ धोना पड़े गा।
प्रश्न 12
उत्तर
पंडित जी, जिस घटना पर आप इतना आश्चर्य कर रहे हैं, वह केवल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के माध्यम से अल्लाह का एक चमत्कार था। हमने यह दावा कभी नहीं किया कि किसी मनुष्य के लिए चाँद के दो टुकड़े करना संभव था। यदि आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ मानते हैं तो ईश्वर अपनी रचित सृष्टि का हमसे कहीं अधिक ज्ञान रखते हैं। अल्लाह के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं कि चाँद के दो टुकड़े करदे और दुनिया में उथल पुथल भी न हो। यह चमत्कार मक्का के मूर्ति पूजकों के आग्रह पर दिखाया गया। उन्हों ने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से अनुरोध किया कि यदि वह अल्लाह के सच्चे ईशदूत हैं तो चाँद के दो टुकड़े करें, और यदि वह ऐसा करदें तो सारे मूर्तिपूजक उनके सच्चे ईशदूत होने पर विशवास करें गे। लेकिन यह चमत्कार देखने के बाद भी उन्हों ने विशवास नहीं किया.
आप पूछते हैं कि चाँद को फिर जोड़ा किसने? जिसने तोडा उसी सर्वशक्तिमान अल्लाह ने जोड़ भी दिया।
हनुमान जी के बारे में उत्तर पढ़ने से पहले यह समझ लीजियह कि वर्त्तमान रामयाण की ऐतिहासिकता की पुष्टि कुरआन नहीं करता। हमारी यह मान्यता है कि एक अल्लाह के ईशदूत (पैगम्बर) के बगैर कोई ऐसे विशाल चमत्कार नहीं दिखा सकता। हनुमान जी के जिस चमत्कार के बारे में आप पूछ रहे हैं वह जिस सन्दर्भ में हमें मिलता है, उसमें उस का विशवास नहीं किया जा सकता। हनुमान जी ने सूर्य को फल समझ के निगल दिया था। अब हम ऐसे चमत्कारों में विश्वास नहीं रखते जो व्यर्थ हों या जिन से कोई लाभ नहीं। चाँद के दो टुकड़े करने में और हनुमान जी का सूर्य को फल समझ के निगलने में कोई तुलना ही नहीं।
पंडित जी, कृपया आप लोगों को समझाने का कष्ट करें गे कि सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य जवान जवान कैसे पैदा हुए थे जैसा कि आपके गुरु स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 8 में लिखा है? इस बात को आप किस विज्ञान के आधार पर सिद्ध करें गे?

वेदों में चमत्कारिक घटनाएं



सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों के जवान जवान टपक जाने के अतिरिक्त कई और चमतारिक घटनाओं का विवरण वेदों में मिलता है। उदाहरण के लिए देखियह-
1. ऋग्वेद 3/33/5 में विश्वामित्र जी ने मंत्र पढ़ कर सतलुज और ब्यास नदियों को खड़ा कर दिया था। सुनिए-
रमध्वं मे वचसे सोम्याय रतावरीरुप मुहूर्तमेवैः |
पर सिन्धुमछा बर्हती मनीषावस्युरह्वे कुशिकस्य सूनुः ||
अर्थात "हे जलवती नदियों, आप हमारे नम्र और मधुर वचनों को सुन कर अपनी गति को एक क्षण के लिए विराम दे दें। हम कुशक पुत्र अपनी रक्षा के लिए महती स्तुतियों द्वारा आप नदियों का भली प्रकार सम्मान करते हैं."
निरुक्त अध्याय 2, खण्ड 24 से 26 में इस मंत्र का स्पष्ट अर्थ बताया गया है। अब ऋग्वेद के इस मंत्र में आपके लिए दो प्रश्न हैं। यहाँ, ऋषि विश्वामित्र सीधे सीधे नदियों से बातें कर रहे हैं। इस को आप क्या कहें गे? और केवल ऋषि विश्वामित्र के मंत्र जपने से ही वे नदियाँ कैसे ठहर गयीं?
2. ऋग्वेद 4/19/9 के अनुसार दीमक द्वारा खाए गए कुँवारी के बेटे को इन्द्र ने फिर से जीवित किया और सारे अंगों को इकट्ठे करदिया.
वम्रीभिः पुत्रम अग्रुवह अदानं निवेशनाद धरिव आ जभर्थ |
वय अन्धो अख्यद अहिम आददानो निर भूद उखछित सम अरन्त पर्व ||
अर्थात "हे इन्द्रदेव, आपने दीमकों द्वारा भक्ष्यमान 'अग्रु' के पुत्र को उनके स्थान (बिल) से बाहर निकाला। बाहर निकाले जाते समय अंधे 'अग्रु'-पुत्र ने आहि (सर्प) को भली प्रकार देखा। उसके बाद चींटियों द्वारा काटे गए अंगों को आपने (इन्द्रदेव ने) संयुक्त किया (जोड़ा)."
3. ऋग्वेद 4/18/2 में वामदेव ऋषि ने मां के पेट में से इन्द्रदेव से बात की-
नाहम अतो निर अया दुर्गहैतत तिरश्चता पार्श्वान निर गमाणि |
बहूनि मे अक्र्ता कर्त्वानि युध्यै तवेन सं तवेन पर्छै ||
अर्थात वामदेव कहते हैं, "हम इस योनिमार्ग द्वारा नहीं निर्गत होंगे। यह मार्ग अत्यंत दुर्गम है। हम बगल के मार्ग से निकलेंगे। अन्यों के द्वारा करने योग्य अनेकों कार्य हमें करने हैं। हमें एक साथ युद्ध करना है, तथा एक के साथ वाद-विवाद करना है."
4. अथर्ववेद 4/5/6-7 चोर के लिए ऐसे मंत्र हैं जिनको जपने से घर के सारे सदस्य सो जाते हैं और चोर बड़े आराम से चोरी कर सकता है।
स्वप्तु माता स्वप्तु पिता स्वप्तु क्ष्वा स्वप्तु विश्पतिः |
स्वपन्त्वस्यै ज्ञातयः स्वपत्वयमभितो जनः ||
स्वप्न स्वप्नाभिकरणेन सर्वं नि ष्वापया जनम |
ओत्सूर्यमन्यान्त्स्वापयाव्युषं जागृतादहमिन्द्र  इवारिष्टो अक्षितः ||
अर्थात "माँ सो जाए, पिता सो जाए, कुत्ता सो जाए, घर का स्वामी सो जाए, सभी बांधव एवं परिकर के सब लोग सो जाएं। हे स्वप्न के अधिष्ठाता देव, स्वप्न के साधनों द्वारा आप समस्त लोगों को सुला दें तथा अन्य लोगों को सूर्योदय तक निद्रित रखें। इस प्रकार सबके सो जाने पर हम इन्द्र के सामान, अहिंसित तथा क्षयरहित होकर प्रातःकाल तक जागते रहे."
कहिए पंडित जी, यह कैसी विद्या है?
प्रश्न 13
उत्तर
कुरआन मानता है कि पहले ईश्वरीय पुस्तकें आई हैं मगर इसी के साथ यह भी कहता है कि बेईमान लोगों ने उन में कई परिवर्तन कर दिए हैं। इसलिए अब उनमें जिन बातों की पुष्टि कुरआन करता है, वे सत्य हैं और जो बातें कुरआन के विरुद्ध हैं वे किसी ने मिला दी हैं। अल्लाह फरमाते हैं-
وَأَنْزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ
"हम (अल्लाह) ने आपकी ओर (ऐ नबी) कुरआन उतारा है जो अपने से पहली पुस्तकों की पुष्टि करता है और उनका संरक्षक है (अर्थात गलत को सही से अलग करता है)." [सूरह माइदा 5; आयात 48]
तो पिछली किताबों में जो गलत शिक्षाएं मिला दी गयी थीं, उनका खंडन कुरआन ने किया। उदाहरण के लिए देवता पूजा, अवतार पूजा, हजरत ईसा की पूजा, पुनर्जनम, स्त्री का अपमान, सती प्रथा, मनुष्य बलि, सन्यास, वर्णाश्रम, आदि.
इस प्रमाण से आपके प्रश्न का कोई आधार नहीं है, अल्लाह का ज्ञान अधूरा नहीं और ना ही पिछली किताबों में कोई कमी थी।
इसके अतिरिक्त यह भी सुन लीजिए कि यदि अग्नि ऋषि को, आप के अनुसार, ईश्वर ने ऋग्वेद दिया तो आदित्य ऋषि को सामवेद क्यों दिया? क्या ऋग्वेद में कोई कमी रह गयी थी जो सामवेद देना पड़ा? सामवेद तो ऋग्वेद मण्डल 9 की पूरी नक़ल है। सिवाय 75 मन्त्रों के जो नए हैं, सामवेद के 1800 मंत्र ऋग्वेद में पहले से हैं। यह 75 मंत्र भी अग्नि को क्यों नहीं दिए? यदि यह कहा जाए कि सामवेद के मंत्र गाने के लिए अलग किए गए हैं तो ऋग्वेद में लिखा जा सकता था कि मंडल 9 को गा लिया करो। इसके अतिरिक्त यजुर्वेद और अथर्ववेद भी व्यर्थ हैं जिन में एक बड़ा हिस्सा ऋग्वेद से लिया गया है। क्या अग्नि ऋषि को ऋग्वेद देते समय आपके ईश्वर भूल गए थे कि उसे सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी देना है?
प्रश्न 14
उत्तर
'विज्ञान विरुद्ध' आपत्ति का उत्तर प्रश्न 12 में दे दिया। हज़रत मरयम से बिन पति के संतान का पैदा होना सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ ईश्वर के लिए कोई बड़ी बात नहीं। आप विज्ञान को वहाँ लागू कर रहे हैं जहां उसका ज्ञानक्षेत्र नहीं है। आप पहले इस प्रश्न का उत्तर दीजियह कि सृष्टि के आरम्भ में कई मनुष्यों का जवान जवान प्रकट होना किस विज्ञानं के आधार पर सिद्ध करोगे (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 8)? अल्लाह ने हज़रत मरयम की शर्म गाह (योनी) में फूँक नहीं मारा, यह आपका खुला झूठ है। इस आयत का सही अनुवाद करने से पहले में आपको आयत का सन्दर्भ बता लेता हूँ.
हज़रत मरयम पर जिस समय लोग व्यभिचार का आरोप लगा रहे थे उस का उत्तर देते हुए अल्लाह ने फरमाया-
وَالَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِنْ رُوحِنَا وَجَعَلْنَاهَا وَابْنَهَا آيَةً لِلْعَالَمِينَ
और वह नारी जिसने अपनी पवित्रता की रक्षा की थी, हमने "उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया" [सूरह अंबिया 21; आयत 91]
यहाँ पर अरबी शब्द 'अह्सनत फर्जहा' का अर्थ होता है अपनी पवित्रता (अर्थात इज्ज़त) की सुरक्षा। हज़रत मरयम की एक खूबी यहाँ यह बतायी गयी कि उन्हों ने अपनी शेह्वत (वासना) को काबू में रखा।
'आत्मा (रूह) फूंकने' का अर्थ है आत्मा का शरीर में प्रवेश कराना। इस प्रकार का जनम हज़रत मरयम और हजरत ईसा के साथ एक विशेष मामला था जिसके विशेष कारण थे। इस बात को सारे मनुष्यों पर लागू नहीं कर सकते।
हज़रत मरयम का बिना पति के संतान पैदा करना आधुनिक विज्ञान के अनुसार संभव था
आधुनिक विज्ञान ने एक नयी खोज कर ली है जिसमें बिना बाप के पुरुष संतान पैदा हो सकती है। इसको वैज्ञानिक भाषा में पार्थीनोजेनेसिस (parthenogenesis) कहा जाता है। पहले पहले यह केवल निचले कीड़े मकोड़ों में देखा जाता था, लेकिन 2 अगस्त 2007 को यह पता चल गया कि दक्षिण कोरया के वैज्ञानिक Hwang Woo-Suk ने parthenogenesis के माध्यम से पहला मनुष्य भ्रूण (embryo) पैदा किया। अधिक जानकारी के लिए देखिए यह वेबसाइट
तो पंडित जी, अफ़सोस कि विज्ञान ने आपका साथ नहीं दिया बल्कि कुरआन की पुष्टि करदी। निश्चित रूप से कुरआन अल्लाह की कित्ताब है जिस पर अब आपको विशवास करना चाहिए।

गड़े से अगस्त्य और वसिष्ठ
ऋग्वेद में आता है कि मित्र और वरुण देवता उर्वशी नामक अप्सरा को देख कर कामपीडित हुए। उन का वीर्य स्खलित हो गया, जिसे उन्होंने यज्ञ कलश में दाल दिया। उसी कलश से अगस्त्य और वसिष्ठ उत्पन्न हुए:
उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या बरह्मन मनसो.अधि जातः |
दरप्सं सकन्नं बरह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे तवाददन्त ||
स परकेत उभयस्य परविद्वान सहस्रदान उत वा सदानः |
यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः ||
सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम |
ततो ह मान उदियाय मध्यात ततो जातं रषिमाहुर्वसिष्ठम ||
- ऋग्वेद 7/33/11-13
अर्थात "हे वसिष्ठ, तुम मित्र और वरुण के पुत्र हो। हे ब्रह्मण, तुम उर्वशी के मन से उत्पन्न हो। उस समय मित्र और वरुण का वीर्य स्खलन हुआ था। विश्वादेवगन ने दैव्य स्तोत्र द्वारा पुष्कर के बीच तुम्हें धारण किया था। यज्ञ में दीक्षित मित्र और वरुण ने स्तुति द्वारा प्रार्थित हो कर कुंभ के बीच एकसाथ ही रेत (वीर्य) स्खलन किया था। अनंतर मान (अगस्त्य)उत्पन्न हुए। लोग कहते हंस कि ऋषि वसिष्ठ उसी कुंभ से जन्मे थे."
आप बोलिए यह कैसे संभव है? आपके तो देवता भी अप्सराओं को देख कर आपे से बाहर हो जाते हैं।
प्रश्न 15
उत्तर
पंडित जी, आपका अंतिम प्रश्न तो झूठ का भंडारघर है। पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने हज़रत जैनब से इस्लामी नियम के अनुसार निकाह किया। पंडित जी ने अपने दावे का कोई प्रामाणिक हवाला नहीं दिया जो की उनकी बुरी आदत है। लेकिन फिर भी मैं उत्तर दे रहा हूँ। आसमान में निकाह हुआ, यह एक गलत फहमी है। कुछ अहादीस में आता है कि हज़रत जैनब गर्व किया करती थीं कि मेरा निकाह आसमान पर हुआ। बात करने की यह विशेष शैली उन्होने इस कारण अपनाई, क्योंकि कुरआन में अल्लाह ने विशेषतः इस निकाह का वर्णन इन शब्दों में किया है।
فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا
अतः जब ज़ैद उससे अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका (अर्थात तलाक दे दिया) तो हमने उसका तुमसे विवाह कर दिया [सूरह अहज़ाब 33; आयत 37]
इस में जो शब्द زَوَّجْنَاكَهَا आया है जिस से कई लोगों ने गलत समझ लिया है कि यह निकाह वास्तव में आसमान में हुआ। हालांकि यह शब्द केवल इतना व्यक्त करता है कि जैनब से निकाह अल्लाह के आदेश से हुआ। कई विश्वसनीय पुस्तकों में निकाह का स्पष्ट वर्णन है। जैनब के भाई अबू अहमद उनकी तरफ से वली थे। सीरत इबने हिशाम में इस निकाह के बारे इस प्रकार है,
تزوج  رسول الله صلى الله عليه و سلم زينب بنت جحش و زوجه إياها أخوها أبو أحمد بن جحش ، و أصدقها رسول الله صلى الله عليه و سلم أربع مائة درهم
अर्थात, रसूलल्लाह (सल्ल.) ने जैनब बिंते जहश के साथ निकाह किया और उस के भाई अबू अहमद ने वकालत की। रसूलल्लाह (सल्ल.) ने जैनब को 400 दिरहम महर दिया। [सीरत इबने हिशाम, जिल्द 4, बाब अज़्वाज नबी]
यह रिवायत आपको तबकाते इबने साद, मुस्तद्रक हाकिम, और उसदुल गाब्बह में भी मिले गी। इसके अतिरिक्त सही बुखारी में भी इस निकाह पर दिए गए वलीमे का वर्णन कुछ इस प्रकार है।
عن أنس قال :أولم النبي بزينب فأوسع المسلمين خيرا فخرج كما يصنع إذا تزوج
अर्थात, अनस ने फरमाया: नबी (सल्ल.) ने जैनब से निकाह के अवसर पर वलीमा दिया और मुसलमानों के लिए अच्छा भोजन प्रदान किया।  [सही बुखारी; कितबे निकाह, बाब 56]

वैदिक शिक्षा के नमूने
1. नियोग के नाम पर व्यभिचार
व्यभिचार का अर्थ है पति या पत्नी के जीवित व मित्र होने की स्तिथि में किसी अन्य स्त्री या पुरुष से अवैध रूप में यौनसंबंध स्थापित करना। हिन्दू धर्मशास्त्रों में इस व्यभिचार को 'नियोग' के नाम पर वैध करार दिया गया है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश (चतुर्थ समुल्लास) में इस प्रथा का विस्तार पूर्वक पूर्ण समर्थन किया है। उन्होंने वेदों और मनुस्मृति के प्रमाण उपस्थित कर के इसकी वैधता प्रतिपादित की है.
ऋग्वेद 10/40/2 में 'विधवेव देवरम' आता है। इसका अर्थ करते हुए स्वामी दयानन्द ने लिखा है- "जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है, वैसे ही तुम भी करो." फिर उन्होंने निरुक्तकार यास्क के अनुसार 'देवर' शब्द का अर्थ बताते हुए लिखा है-
"विधवा का जो दूसरा पति होता है, उसको देवर कहते हैं." (देखें, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, नियोग प्रकरण)
इसी प्रकार कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कानून बनाए। उस का कहना है कि बूढ़े एवं असाध्य रोग से पीड़ित राजा को चाहिए कि वह अपनी रानी का किसी मातृबंधु (मां की तरफ से जो रिश्तेदार हो यथा मामा आदि) या अपने किसी सामंत से नियोग करवा कर पुत्र उत्पन्न करा ले।(अर्थशास्त्र 1/17)
नियोग कि यह धार्मिक रस्म इंसानी गरिमा के सिद्धांत का हनन करती है।
2. देवदासी प्रथा
दासता का एक रूप सदियों से चला आया है। वह है -देवदासियां। मंदिरों विशेषतः दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासियां रहती हैं। यह वे लडकियां हैं जिन्हें उनके माता पिता बचपन में ही मंदिरों में चढ़ा देते हैं। वहीँ यह जवान होती हैं। इन का देवता के साथ विवाह कर दिया जाता है। इन में से कुछ सुन्दर स्त्रियाँ पन्देपुजारोयों के भोगविलास की सामग्री बनती हैं। शेष देवदर्शन को आए हुए यात्रियों आदि व अन्य लोगों की कामवासना को शांत कर के जीवननिर्वाह करती हैं.
14 अगस्त, 1953 से देवदासी प्रथा कानूनन अवैध घोषित कर दी गयी है। फिर भी यह प्रथा किसी न किसी रूप में हिन्दू मंदिरों में मौजूद है।
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इसी के साथ पंडित महेंद्रपाल आर्य के 15 प्रश्नों के इस्लाम और हिन्दू धर्मशास्त्रों की रौशनी में विस्तृत व सही उत्तर समाप्त हुए। हम आशा करते हैं कि पंडित महेंद्रपाल सत्य को स्वीकार करें गे और इस्लाम की पवित्र छाया में लोट आएं गे। मैंने इस उत्तर में वेदों के भी स्पष्ट उदाहरण देकर यह बता दिया है की वैदिक धर्मी बनने का निमंत्रण मुझे क्यों स्वीकार नहीं है।

4 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

राहे-हक़ के आप हमारे पुराने साथी हैं.
आज आपकी यह नयी पोस्ट पढ़कर पुरानी यादों की लज़्ज़त ताज़ा हो गयी है.

आपने इन जवाबों की कोई किताब भी ज़रूर छपवायी होगी. उस किताब को वर्ल्ड बुक फेयर में रखा जाना चाहिए.

उसमें पंडित जी के प्रशंसकों का भी स्टाल लगता है.

सब तक जवाब पहुँच जाएगा.

सबको ईमान की तौफ़ीक़ हो जायेगी, इन शा अल्लाह.

safat alam taimi ने कहा…

डा. अनवर जमाल साहब! यह मेरे उत्तर नहीं हैं संदर्भ शायद आपने देखा नहीं है। यह मुश्फिक़ सुलतान के उत्तर हैं। http://mushafiqsultan.com/

बेनामी ने कहा…

पं० महेन्द्र पाल आर्य
Mobile 9810797056
ये उनका नंबर है आप उन से जरुर बात करें ।अपने बहस कि रिकोडिंग मुझे भेजे ।pk686019@gmail.com इस पर, कृपया जरुर जवाब दें

बेनामी ने कहा…

पं० महेन्द्र पाल आर्य
Mobile 9810797056

ये नंबर पंडित जी का है आप इनसे फोन पर. यदि बहस लेंगे तो उसकी रिकोडिंग मुझे कृपा कर के भेजिएगा pk686019@gmail.com